The future of artificial intelligence
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)
एक छोटे से शहर ने हमें सिखाईं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बारे में 4 चौंकाने वाली बातें जो
जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के भविष्य के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में अक्सर बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों, वैश्विक महानगरों और हाई-टेक प्रयोगशालाओं की तस्वीरें आती हैं।
हम कल्पना करते हैं कि दुनिया को बदलने वाली तकनीक पर सबसे महत्वपूर्ण चर्चाएँ सिलिकॉन वैली या शंघाई जैसे शहरों में हो रही होंगी।
लेकिन क्या होगा अगर हम कहें कि AI के भविष्य पर कुछ सबसे गहरी और प्रभावशाली बातचीत एक अप्रत्याशित जगह पर हो रही है?
एक छोटे से शहर में हुए घटनाक्रमों ने AI के बारे में हमारी सोच को चुनौती दी है और चार आश्चर्यजनक सच्चाइयों को उजागर किया है।
content
- 1. AI पर वैश्विक चर्चा अब सिर्फ़ महानगरों में नहीं होती
- 2. भविष्य की तकनीक को गांधीवादी विद्वान दिशा दे रहे हैं
- 3. AI की अगली पीढ़ी स्कूलों में तैयार हो रही है
- 4. AI का असली मकसद
यह सोचना आम है कि वैश्विक तकनीकी संवाद बड़े शहरों तक ही सीमित है, लेकिन फागी जैसे एक उपखंड मुख्यालय ने इस धारणा को तोड़ दिया। यहीं पर 'सतत विकास, मानवता और कृत्रिम बुद्धिमताः चुनौतियां और समाधान' विषय पर एक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया।
इस सम्मेलन की गंभीरता का अंदाज़ा स्वीडन के स्टॉकहोम स्थित यूनिवर्सिटी कॉलेज से डॉ. करम प्रिया मुरबोट जैसी अंतरराष्ट्रीय विद्वान की भागीदारी से लगाया जा सकता है।
यह इस बात का एक शक्तिशाली संकेत है कि AI जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों पर चर्चा अब विकेंद्रीकृत हो रही है और छोटे शहरों तक भी पहुंच रही है,
जिससे यह संवाद अधिक समावेशी बन रहा है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि जब AI पर चर्चा छोटे शहरों में होती है, तो यह सुनिश्चित होता है कि तकनीक का विकास केवल शहरी जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि ग्रामीण और स्थानीय चुनौतियों के समाधान के लिए भी हो।
और तरराष्ट्रीय विद्वान ने दिखाया कि वैश्विक संवाद के लिए एक नया मंच तैयार है।
शायद इस सम्मेलन का सबसे आश्चर्यजनक पहलू इंडियन सोसाइटी ऑफ गांधीयन स्टडीज से जुड़े वरिष्ठ विद्वानों की प्रमुख उपस्थिति थी। प्रोफेसर सुधीर चंद जैना, डॉ. बाबूलाल देवंदा, प्रोफेसर सतीश राय और प्रोफेसर शीला राय जैसे प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की भागीदारी ने एक स्पष्ट संदेश दिया: AI का विकास केवल तकनीकी विशेषज्ञों के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।
उनकी उपस्थिति इस बात पर जोर देती है कि लक्ष्य "मानव-केंद्रित एआई" (Human-centric AI) बनाना है। यह गांधीजी के 'सर्वोदय' (सभी का उदय) और 'अंतिम व्यक्ति' (the last person) के सिद्धांतों को तकनीक में पिरोने का एक प्रयास है, ताकि AI का लाभ समाज के सबसे वंचित व्यक्ति तक भी पहुंच सके। यह गांधीवादी सिद्धांतों और भविष्य की तकनीक का एक अनूठा संगम है, जो यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि तकनीकी नवाचार मानवता की सेवा करे,
और यह संगम फागी जैसे छोटे शहर में हो रहा है, जो परंपरा और आधुनिकता के मेल का प्रतीक है।
फागी में जहां एक ओर वैश्विक विद्वान AI के नैतिक भविष्य पर मंथन कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर, इसी क्षेत्र में AI की अगली पीढ़ी की नींव भी रखी जा रही थी।
महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय के 63 छात्र-छात्राओं ने एक शैक्षणिक भ्रमण के तहत वनस्थली विद्यापीठ का दौरा किया। वहां, उन्हें प्रयोगशालाओं, रोबोटिक्स और विशेष रूप से AI विभाग से परिचित कराया गया।
विद्यार्थियों को पीपीटी के माध्यम से विश्वविद्यालय की गतिविधियों के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी गई।
यह जमीनी स्तर पर एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। जब स्कूली बच्चों को इतनी कम उम्र में AI जैसी उन्नत तकनीक से अवगत कराया जाता है, तो यह भविष्य के लिए एक मजबूत नींव रखता है।
यह साबित करता है कि भारत के तकनीकी भविष्य की जड़ें उसके छोटे शहरों और कस्बों में भी उतनी ही गहरी हैं।
AI का असली मकसद क्या हैं 'सतत विकास' की चुनौतियों का समाधान करना है
अक्सर AI को केवल एक शक्तिशाली तकनीक के रूप में देखा जाता है, लेकिन फागी में हुए सम्मेलन ने इसके गहरे उद्देश्य को उजागर किया। सम्मेलन का प्राथमिक लक्ष्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से सतत विकास की चुनौतियों के लिए व्यावहारिक समाधानों पर अकादमिक और शोध-आधारित विमर्श को प्रोत्साहित करना था।
यह AI को केवल एक तकनीकी उपकरण के बजाय वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल करने के एक माध्यम के रूप में स्थापित करता है। यह दृष्टिकोण AI को अमूर्त तकनीक से निकालकर एक व्यावहारिक उपकरण बनाता है—जो शायद भविष्य में फागी जैसे क्षेत्रों में जल प्रबंधन, कृषि उपज या स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। फागी का यह सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि तकनीक का असली उद्देश्य जमीनी समस्याओं को सुलझाना है।
फागी में हुई इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भविष्य अप्रत्याशित तरीकों और स्थानों में आकार ले रहा है। छोटे शहरों से लेकर स्कूली कक्षाओं तक, और गांधीवादी दर्शन से लेकर सतत विकास के लक्ष्यों तक, AI की कहानी हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक गहरी और मानवीय होती जा रही है।
जब तकनीक पर चर्चा गांधीवादी सिद्धांतों और सतत विकास के लक्ष्यों के साथ जुड़ जाती है, तो क्या यह AI के भविष्य को अधिक मानवीय और न्यायसंगत बनाने का सबसे अच्छा तरीका नहीं है?
कोई टिप्पणी नहीं