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'कलम और कलेक्टरी' का अद्भुत संगम:

'कलम और कलेक्टरी' का अद्भुत संगम: डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी की साहित्यिक जीत की 4 बड़ी बातें प्रशासनिक गलियारों की गहमागहमी और साहित्य की मौन साधना अमूमन दो अलग ध्रुव माने जाते हैं। एक ओर जहां फाइलों का अंबार और व्यवस्था की चुनौतियां हैं, वहीं दूसरी ओर संवेदनाओं का अगाध सागर। लेकिन जब एक जिला कलेक्टर अपनी कलम से ग्रामीण जीवन की मर्मस्पर्शी कथाएं बुनता है और उसे देश का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान मिलता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं रह जाती, बल्कि कला और कर्तव्य के दुर्लभ समन्वय का उत्सव बन जाती है। जयपुर के जिला कलेक्टर डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी ने अपने राजस्थानी कहानी संग्रह 'भरखमा' के लिए वर्ष 2025 का 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' जीतकर यह सिद्ध कर दिया है कि एक सजग प्रशासक के भीतर एक कोमल कथाकार भी जीवित रह सकता है। आखिर 'भरखमा' में ऐसा क्या जादुई तत्व है जिसने इसे राष्ट्रीय फलक पर प्रतिष्ठित किया? आइए, इस साहित्यिक यात्रा की चार प्रमुख कड़ियों को समझते हैं। 1. कलेक्टरी के साथ संवेदनशीलता: एक प्रशासनिक अधिकारी का साहित्यिक सफर पहली महत्वपूर्ण बात डॉ. सोनी का वह व्यक्तित्व है जो 'कलेक्टर' और 'कवि-कथाकार' के बीच के फासले को मिटा देता है। डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी केवल आदेश जारी करने वाले अधिकारी नहीं हैं, बल्कि वे राजस्थानी माटी की सुगंध को शब्दों में पिरोने वाले एक प्रखर शिल्पी भी हैं। उनका अब तक का साहित्यिक सफर 'चिराग', 'रेगमाल', 'रणखार', 'यादावरी', 'आपणा रूंख' और 'म्हारै पांती रा पानी' जैसी कृतियों से अलंकृत रहा है। एक 'विशेषज्ञ सांस्कृतिक लेखक' की दृष्टि से देखें तो डॉ. सोनी का प्रशासनिक अनुभव उनके लेखन के लिए उर्वर भूमि का कार्य करता है। कलेक्टरी के दौरान आम आदमी के संघर्षों, अभावों और उनकी जीवटता से उनका सीधा सामना होता है। यही 'जमीनी अनुभव' उनके साहित्य में 'सामाजिक यथार्थ' बनकर उभरता है। उनकी कहानियाँ किसी काल्पनिक लोक की नहीं, बल्कि उसी समाज की हैं जिसे वे प्रतिदिन करीब से देखते और महसूस करते हैं। 2. 'भरखमा': ग्रामीण जीवन और समृद्ध भाषाई विरासत का दस्तावेज दूसरी बड़ी बात इस कृति की विषय-वस्तु और इसकी भाषाई गहराई है। 'भरखमा' केवल कहानियों का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि यह राजस्थान के ग्रामीण परिवेश और वहां के सांस्कृतिक मूल्यों का एक जीवंत दस्तावेज है। डॉ. सोनी अपनी जड़ों और मातृभाषा के प्रति कितने कृतज्ञ हैं, यह उनके इन शब्दों से स्पष्ट झलकता है: "जिस मिट्टी में मैं पला-बढ़ा, जिसकी भाषा की मिठास ने मेरे कानों में मिश्री घोल दी... उसी राजस्थानी भाषा में लिखी मेरी पुस्तक पर मिला यह पुरस्कार मैं उन सभी लोगों को समर्पित करता हूं, जिनसे मैंने राजस्थानी भाषा का ककहरा सीखा।" डॉ. सोनी का मानना है कि राजस्थानी भाषा का अपना एक समृद्ध इतिहास, व्याकरण और शब्दकोश है। 'भरखमा' में उन्होंने इसी भाषाई वैभव का उपयोग कर ग्रामीण जीवन के संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं को उकेरा है। एक समीक्षक के तौर पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह पुस्तक भाषा के संरक्षण की दिशा में एक गंभीर प्रशासनिक और साहित्यिक हस्तक्षेप है। 3. पन्नों से पर्दे तक: साहित्य का सिनेमाई विस्तार तीसरी उल्लेखनीय बात इस कृति का विस्तार है। साहित्य की सार्थकता तब और बढ़ जाती है जब वह जनसाधारण तक पहुँचने के लिए नए माध्यम तलाशती है। 'भरखमा' के साथ भी यही हुआ; इस पर एक राजस्थानी फिल्म का निर्माण हो चुका है, जिसका निर्देशन और मुख्य भूमिका में अभिनय श्रवण सागर ने किया है। इस फिल्म को विभिन्न फिल्म फेस्टिवल्स में न केवल सराहा गया, बल्कि कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा गया है। क्षेत्रीय साहित्य का सिनेमा में रूपांतरण राजस्थानी जैसी भाषाओं को एक नई पहचान दिलाने का सेतु है। जब पन्नों की संवेदना पर्दे पर दृश्य का रूप लेती है, तो वह भाषा की सीमाओं को लांघकर वैश्विक हो जाती है। डॉ. सोनी की यह कहानी आज केवल पाठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि सिनेमाई दर्शकों के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिला रही है। 4. साहित्य अकादमी 2025: राष्ट्रीय गौरव का एक व्यापक परिदृश्य चौथी और अंतिम बात इस पुरस्कार की महत्ता और इसका व्यापक फलक है। 16 मार्च 2026 को साहित्य अकादमी ने 24 भारतीय भाषाओं के लिए इन पुरस्कारों की घोषणा की, जो भारतीय साहित्य के मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण दिन था। इस वर्ष का पुरस्कार परिदृश्य अत्यंत गरिमामयी रहा है। जहाँ राजस्थानी के लिए डॉ. सोनी को चुना गया, वहीं हिंदी में प्रतिष्ठित लेखिका ममता कालिया को उनके संस्मरण 'जीते जी इलाहाबाद' और प्रख्यात राजनयिक नवतेज सरना को उनके अंग्रेजी उपन्यास 'क्रिमसन स्प्रिंग' के लिए सम्मानित करने का निर्णय लिया गया। यह पुरस्कार केवल सम्मान नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है। आगामी 31 मार्च को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले भव्य समारोह में सभी विजेताओं को 1 लाख रुपये की राशि और एक विशेष रूप से नक्काशीदार तांबे की पट्टिका प्रदान की जाएगी। यह आयोजन भारत की विविध भाषाई समृद्धि का संगम होगा, जहाँ डॉ. सोनी जैसे लेखक अपनी मातृभाषा का प्रतिनिधित्व करेंगे। निष्कर्ष डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी की यह विजय राजस्थानी भाषा के आत्म-सम्मान की विजय है। डॉ. सोनी केवल पुरस्कार पाकर रुकना नहीं चाहते; उनकी आकांक्षा बड़ी है। वे चाहते हैं कि राजस्थानी भाषा केवल साहित्य की शोभा न रहे, बल्कि वह आम जन के 'व्यवहार और व्यापार' की भाषा बने। उनकी यह उपलब्धि हमें यह सोचने पर विवश करती है कि प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच भी अपनी जड़ों और अपनी भाषा से कैसे जुड़ा रहा जा सकता है। अंत में, एक विचारणीय प्रश्न हम सभी के लिए है: "क्या हम अपनी मातृभाषा को वही 'व्यवहार और व्यापार' का दर्जा और सम्मान देने के लिए तैयार हैं, जिसकी कामना डॉ. सोनी ने की है और जिसके लिए वे निरंतर प्रयासरत हैं?"

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