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10 वर्षों बाद आचार्य वर्धमान सागर का जयपुर की ओर मंगल विहार

10 वर्षों बाद आचार्य वर्धमान सागर का जयपुर की ओर मंगल विहार: श्रद्धा और भक्ति का संगम

जयपुर के धर्मानुरागी श्रावक-श्राविकाओं के लिए यह अहोभाग्य और एक दशक की लंबी प्रतीक्षा के पूर्ण होने का क्षण है। वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज पूरे 10 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पुनः जयपुर की धरा पर मंगल प्रवेश करने जा रहे हैं। बुधवार की पावन बेला में आचार्यश्री ने अतिशय क्षेत्र पदमपुरा से शिवदासपुरा की ओर अपनी धर्म-यात्रा (मंगल विहार) का श्रीगणेश किया। इस ऐतिहासिक पल को लेकर संपूर्ण राजधानी के जैन समाज के अंतर्मन में श्रद्धा की हिलोरें उठ रही हैं और चारों ओर एक अपूर्व आध्यात्मिक उत्साह व्याप्त है।

(Saved responses are view only) आचार्य वर्धमान सागर के साथ विहार कर रहे संघ में कुल 10 मुनिराज शामिल हैं। स्रोतों में विशेष रूप से निम्नलिखित मुनिराजों के नाम प्रमुखता से दिए गए हैं: मुनि हितेंद्रसागर मुनि प्रभवसागर मुनि चिंतन सागर मुनि दर्शितसागर मुनि प्रबुद्ध सागर ये मुनिराज आचार्य श्री के साथ पदमपुरा से जयपुर की ओर हो रहे मंगल-विहार का हिस्सा हैं। इस संघ की कुछ अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएं इस प्रकार हैं: विशाल संघ: इन 10 मुनिराजों के अतिरिक्त संघ में 20 आर्यिकाएं, 1 ऐलक और 3 क्षुल्लक भी सम्मिलित हैं। कुल संख्या: आचार्य श्री सहित इस पूरे संघ में कुल 35 साधु-साध्वियां (35 पीछी) शामिल हैं। आहार और विहार: इन मुनिराजों ने आचार्य श्री के सान्निध्य में पदमपुरा में आहार चर्या संपन्न की और उसके बाद जयपुर की ओर प्रस्थान किया। भूमिका: ये सभी मुनिराज आचार्य वर्धमान सागर के नेतृत्व में धर्म प्रभावना करते हुए पदमपुरा से शिवदासपुरा होते हुए जयपुर की ओर बढ़ रहे हैं। स्रोतों में इन मुनिराजों के व्यक्तिगत जीवन या उनकी दीक्षा के बारे में अतिरिक्त विवरण उपलब्ध नहीं है।

मुख्य घटनाक्रम: स्वर्ण कलश अभिषेक और शांतिधारा

विहार के मंगल प्रारंभ से पूर्व, आचार्यश्री के पावन सान्निध्य में पदमपुरा स्थित भूगर्भ से प्रकट मूलनायक भगवान पदमप्रभ का अभिषेक एवं शांतिधारा का भव्य अनुष्ठान संपन्न हुआ। इस मांगलिक अवसर के मुख्य आकर्षण निम्नलिखित रहे:
मूलनायक पदमप्रभ भगवान का स्वर्ण कलशों से अभिषेक और मंगल शांतिधारा संपन्न हुई।
बाल ब्रह्मचारी गज्जू भैया, परमीत, छोटू, राजेश पंचोलिया, बाबूलाल, निर्मल छाबड़ा और समर कंठाली सहित अन्य सौभाग्यशाली श्रद्धालुओं द्वारा प्रथम कलश अभिषेक का पुण्यार्जन किया गया।

होली के पावन पर्व पर प्रभु का विशेष पंचामृत अभिषेक आयोजित हुआ, जिसमें जल, नारियल पानी, दूध, दही, घी, केसर, पुष्प, औषधि, हल्दी, चावल चूर्ण एवं सुगंधित जल जैसे विविध पवित्र द्रव्यों का प्रयोग किया गया।
इस अभिषेक क्रिया में समर कंठाली, दीपक प्रधान, लवीश पंचोलिया, राजेश पंचोलिया और पंडित अशोक सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भक्तिपूर्वक सहभागिता की।

आचार्य संघ का विवरण
आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज के साथ तप और संयम का जीवंत प्रतीक एक विशाल संघ चल रहा है। इस संघ की गरिमामयी चर्या श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। संघ का विवरण इस प्रकार है:
कुल पिछी: 35
मुनिराज: 10 (मुनि श्री हितेंद्रसागर, प्रभवसागर, चिंतन सागर, दर्शितसागर, प्रबुद्ध सागर एवं अन्य मुनिराज)
आर्यिका माताजी: 20
ऐलक जी: 1
क्षुल्लक जी: 3
कुल साधु-साध्वी संख्या: 34

विहार मार्ग और आध्यात्मिक पड़ाव

पदमपुरा से जयपुर की ओर बढ़ते आचार्यश्री के कदम धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। इस मंगल विहार की रूपरेखा अत्यंत सुव्यवस्थित रखी गई है:
प्रथम दिवस का विहार:
बुधवार को आहारचर्या के उपरांत संघ ने लगभग 2.5 किलोमीटर की दूरी तय की।
रात्रि विश्राम: संघ का प्रथम रात्रि विश्राम पदमपुरा स्थित 'अखिल भारतीय मानव कल्याण सेवा आश्रम संस्थान' में हुआ। आगामी गंतव्य:
गुरुवार को संघ लगभग 3.3 किलोमीटर का विहार कर शिवदासपुरा पहुंचेगा। यहाँ स्थित 'खाटू श्याम कॉलेज' में आचार्यश्री के आहार का पावन कार्यक्रम प्रस्तावित है।

भक्तों का निवेदन और श्रद्धा का सैलाब
1. पदमपुरा की धरा से जयपुर की ओर: एक आध्यात्मिक पुनर्जागरण राजस्थान की मरुधरा पर जब किसी महान तपस्वी के कदम पड़ते हैं, तो वह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि श्रमण संस्कृति के गौरवशाली इतिहास का जीवंत अध्याय बन जाती है। अतिशय क्षेत्र पदमपुरा, जहाँ की माटी से 'भूगर्भ' से प्रकट मूलनायक पदमप्रभ भगवान की प्रतिमा ने प्रकट होकर श्रद्धा का नया मार्ग प्रशस्त किया था, आज फिर एक ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना है। पूरे एक दशक के लंबे अंतराल के बाद, वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज का 'मंगल विहार' जयपुर की ओर प्रारंभ हुआ है। 10 वर्षों का यह मौन प्रतीक्षा काल अब समाप्त हो रहा है, और जयपुर की गलियों में संयम और तपोबल की गूंज सुनाई देने वाली है। यह विहार केवल भौगोलिक दूरी तय करना नहीं, बल्कि आधुनिकता के शोर में दबी आध्यात्मिक चेतना को जगाने का एक महाभियान है। 2. एक दशक का धैर्य और सांस्कृतिक उत्सव आचार्य श्री का जयपुर में आगमन एक युग के परिवर्तन जैसा है। पिछली बार जब उनके कदम जयपुर की धरती पर पड़े थे, तब से लेकर आज तक एक पूरी पीढ़ी बदल चुकी है, लेकिन श्रद्धा वही है। गुरु का आगमन किसी भी क्षेत्र के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं होता, बल्कि यह उस समाज की सामूहिक ऊर्जा का पुनर्जागरण होता है। बुधवार को जब पदमपुरा से शिवदासपुरा की ओर आचार्य श्री ने प्रस्थान किया, तो श्रद्धालुओं की आंखों में 10 साल का इंतजार भक्ति के आंसुओं और जयकारों के रूप में छलक पड़ा। 3. स्वर्ण कलशों का वैभव और 11 द्रव्यों का दिव्य अभिषेक विहार के मंगल प्रारंभ से पूर्व पदमपुरा में एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जिसे देखकर लगा मानो देवलोक धरती पर उतर आया हो। भूगर्भ से प्रकट भगवान पदमप्रभ का स्वर्ण कलशों से अभिषेक किया गया। जहाँ दुनिया बाहर होली के रंगों में सराबोर थी, वहीं पदमपुरा में 'आध्यात्मिक होली' खेली जा रही थी—पवित्रता और आंतरिक शुद्धि की होली। इस शांतिधारा और पंचामृत अभिषेक में बाल ब्रह्मचारी गज्जू भैया, समर कंठाली, परमीत, राजेश पंचोलिया और निर्मल छाबड़ा जैसे प्रमुख श्रावकों ने प्रथम कलश का सौभाग्य प्राप्त किया। शास्त्रोक्त विधि से भगवान का अभिषेक इन 11 विशिष्ट द्रव्यों से किया गया: जल और नारियल पानी दुग्ध, दही और घृत (घी) केसर और सुगंधित पुष्प दिव्य औषधि और हल्दी चावल चूर्ण एवं सुगंधित जल "पदमपुरा की पावन धरा पर स्वर्ण कलशों से गिरती शांतिधारा की धार, आचार्य श्री के तपोबल के तेज के साथ मिलकर वातावरण को पूरी तरह अलौकिक बना रही थी।" 4. '35 पीछी' का संघ: चलता-फिरता आध्यात्मिक विश्वविद्यालय आचार्य श्री के साथ चल रहा विशाल संघ अनुशासन और सामूहिकता का एक अद्भुत उदाहरण है। इस संघ को '35 पीछी' के नाम से संबोधित किया जा रहा है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि संघ में 34 साधु-साध्वी हैं, जिनमें 10 प्रबुद्ध मुनिराज (मुनि हितेंद्रसागर, प्रभवसागर, चिंतन सागर, दर्शितसागर, प्रबुद्ध सागर आदि), 20 आर्यिकाएं, 1 ऐलक और 3 क्षुल्लक शामिल हैं। '35वीं पीछी' स्वयं आचार्य वर्धमान सागर जी की है, जो इस पूरे संघ के मार्गदर्शक और सूर्य के समान हैं। इतने बड़े संघ का एक साथ मौन और अनुशासित विहार अहिंसा के उस मार्ग को दर्शाता है, जिस पर चलना आज के युग में कठिनतम साधना है। 5. जन-जन की विनती: भक्ति का उमड़ता महासागर जैसे ही संघ ने पदमपुरा की सीमा लांघी, श्रद्धालुओं का एक विशाल 'जन-सैलाब' उनके पीछे हो लिया। जयपुर के विभिन्न जैन मंदिरों की प्रबंध कमेटियों में आचार्य श्री को अपने क्षेत्र में लाने की एक पवित्र होड़ सी मची है। पदमपुरा कमेटी के अध्यक्ष सुधीर जैन और मंत्री हेमंत सोगानी के साथ-साथ जयपुर के अनेक मंदिरों के पदाधिकारियों ने आचार्य श्री के समक्ष श्रीफल भेंट कर 'मंगल प्रवेश' का निवेदन किया है। सड़कों पर बिछी पलकें और हर घर के बाहर बने रंगोली के मांडने इस बात का प्रमाण हैं कि जयपुर अपने 'गुरु' के स्वागत के लिए किस कदर आतुर है। 6. विहार के पड़ाव: भक्ति और संयम की यात्रा संतों का विहार केवल चलना नहीं, बल्कि एक कठिन चर्या है। इस यात्रा के प्रारंभिक चरण पूरी तरह अनुशासन में बंधे रहे: प्रथम दिवस (बुधवार): संघ ने 2.5 किलोमीटर का सफर तय किया। विहार के बाद प्रथम रात्रि विश्राम पदमपुरा स्थित 'अखिल भारतीय मानव कल्याण सेवा आश्रम संस्थान' में हुआ। द्वितीय दिवस (गुरुवार): संघ ने लगभग 3.3 किलोमीटर का विहार किया। इस दिन संघ के आहार का पुण्य अर्जन शिवदासपुरा स्थित 'खाटू श्याम कॉलेज' के प्रांगण में संपन्न हुआ। यह छोटे-छोटे पड़ाव हमें सिखाते हैं कि लक्ष्य कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर कदम संयमित और विचार पवित्र हों, तो दूरी स्वयं सिमट जाती है। 7. निष्कर्ष: आधुनिकता के बीच संयम का सेतु आचार्य वर्धमान सागर जी का यह विहार हमें ठहरकर सोचने पर मजबूर करता है। क्या 10 साल का यह लंबा इंतजार केवल एक समय का अंतराल था? शायद नहीं। यह अंतराल था हमारी श्रद्धा की परीक्षा का। आज जब दुनिया तकनीक और गति के पीछे भाग रही है, तब नंगे पैर चलता यह '35 पीछी' का संघ हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश दे रहा है। अंतिम चिंतन: क्या संतों की ये मंद और धीर-गंभीर पदयात्राएं आधुनिक समाज के लिए प्राचीन संस्कारों और संयम को जोड़ने वाला एक जीवंत सेतु नहीं हैं? एक महान संत का आगमन किसी शहर की केवल भौगोलिक सीमाओं में प्रवेश नहीं होता, बल्कि उसकी सामूहिक चेतना का शुद्धिकरण होता है। जयपुर अब उसी शुद्धि के लिए तैयार है। आचार्यश्री के जयपुर आगमन की पदचाप सुनते ही पदमपुरा से लेकर जयपुर तक का मार्ग भक्तिमय हो उठा है। पदमपुरा प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष सुधीर जैन, मंत्री हेमंत सोगानी, राजकुमार कोठारी, सुरेश सबलावत, नरेश पाटनी, राजेश सेठी और महावीर पाटनी सहित जयपुर के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों के पदाधिकारियों ने आचार्यश्री के श्रीचरणों में श्रीफल भेंट कर अपने-अपने क्षेत्रों में मंगल प्रवेश हेतु भावभीना निवेदन किया है। आचार्यश्री के दर्शनों हेतु पदमपुरा और समीपवर्ती ग्रामों से श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है।

मुख्य आकर्षण (Quick Highlights) 10 साल बाद जयपुर आगमन: एक दशक की लंबी प्रतीक्षा के पश्चात गुलाबी नगरी की धरा पर आचार्यश्री के पावन चरणों का स्पर्श होगा। पदमपुरा से शिवदासपुरा की ओर प्रस्थान: बुधवार से विहार का मंगल प्रारंभ, मार्ग में श्रद्धालुओं द्वारा भव्य अगवानी। पंचामृत अभिषेक के विविध द्रव्य: होली के अवसर पर दूध, दही, केसर, हल्दी और दिव्य औषधियों से प्रभु का अभिषेक। आइए, हम सब मिलकर इस पुनीत बेला के साक्षी बनें और आचार्य संघ की अगवानी कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करें। --------------------------------------------------------------------------------

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